बिहार राजनीति भारत की सबसे गतिशील और अनुमान लगाने में मुश्किल राज्य राजनीतियों में से एक है। 1990 के दशक से लेकर आज तक, यहाँ सत्ता का पहिया कई बार घूमा है। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार बिहार में सत्ता में है, जिसके मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं। नीतीश कुमार ने अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा का रास्ता चुना, जिसके बाद बिहार को पहली बार एक BJP मुख्यमंत्री मिला। अरविंदालय डेली के इस विस्तृत विश्लेषण में हम बिहार के राजनीतिक दलों, गठबंधनों, जातिगत समीकरणों और वर्तमान सत्ता तानाबाने को सरल हिंदी में समझेंगे।
बिहार की राजनीति: एक नज़र में
बिहार की राजनीति को समझने के लिए तीन बड़े दौरों को समझना ज़रूरी है। पहला दौर 1947 से 1990 तक का है, जब कांग्रेस का वर्चस्व था और ऊँची जातियाँ (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ) राजनीतिक नेतृत्व में हावी थीं। दूसरा दौर 1990 से 2005 तक का है, जब मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से पिछड़ी जातियों, विशेषकर यादवों, का राजनीतिक उदय हुआ और लालू प्रसाद यादव का राजद बिहार की सियासत पर हावी रहा। तीसरा दौर 2005 से अब तक का है, जिसमें नीतीश कुमार की अगुवाई में विकास की राजनीति सामने आई और जातिगत समीकरणों के साथ-साथ शासन सुधार और बुनियादी ढाँचे के मुद्दे भी प्राथमिकता मिली।
इन तीनों दौरों ने बिहार की राजनीति को एक ऐसा रूप दिया है जहाँ जाति, विकास और पहचान तीनों एक साथ चलते हैं। 2025 के विधानसभा चुनावों में NDA की भारी जीत ने एक नया अध्याय खोला, जिसमें विपक्ष का कुचलना राजनीतिक विशेषज्ञों के लिए भी हैरानी का विषय बना।
बिहार की राजनीति की एक और खास बात यह है कि यहाँ नेतृत्व बदलता रहता है, लेकिन नीतीश कुमार 2005 से 2026 तक (कुछ महीनों को छोड़कर) मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा में कई बार गठबंधन बदला, जिसके कारण उन्हें 'पच्चास कुमार' या 'सुशासन बाबू' जैसी उपाधियाँ मिलीं, साथ ही उनके गठबंधन बदलने की आदत पर भी चर्चा होती रही।
बिहार के प्रमुख राजनीतिक दल और उनकी विचारधारा

बिहार की राजनीति में मुख्य रूप से पाँच दलों का दबदबा रहा है: भारतीय जनता पार्टी (BJP), जनता दल यूनाइटेड (JDU), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)। इनके अलावा हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा, राष्ट्रीय लोक मोर्चा, AIMIM और जन सुराज जैसे दल भी सीमित प्रभाव रखते हैं।
नीचे दी गई तालिका में बिहार के प्रमुख राजनीतिक दलों, उनकी विचारधारा और 2025 विधानसभा चुनाव में उनकी सीटों का विवरण दिया गया है:
| दल | विचारधारा / सामाजिक आधार | 2025 विधानसभा सीटें | 2024 लोकसभा सीटें |
|---|---|---|---|
| भाजपा (BJP) | राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, विकासवाद; ऊँची जातियों और गैर-यादव पिछड़ों का समर्थन | 89 | 12 |
| जदयू (JDU) | समाजवाद, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिता; EBC और महादलित वोट बैंक | 85 | 12 |
| राजद (RJD) | सामाजिक न्याय, पिछड़ा राज; यादव और मुस्लिम वोट बैंक | 25 | 4 |
| कांग्रेस | धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद; सीमित मुस्लिम और ऊँची जाति समर्थन | 6 | 3 |
| लोजपा (रामविलास) | दलित और पासवान वोट बैंक; NDA सहयोगी | 19 | 5 |
| हम (सेक्युलर) | महादलित समर्थन; जीतन राम मांझी का नेतृत्व | 5 | 1 |
| रालोमो | कुशवाह वोट बैंक; उपेंद्र कुशवाहा का नेतृत्व | 4 | 0 |
| AIMIM | मुस्लिम वोट बैंक; सीमावर्ती जिलों में प्रभाव | 5 | 0 |
भारतीय जनता पार्टी (BJP)
बिहार में BJP ने पिछले दो दशकों में अपनी स्थिति मजबूत की है। 2025 के विधानसभा चुनाव में इसने 89 सीटें जीतकर विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव हासिल किया। पार्टी का मुख्य सामाजिक आधार ऊँची जातियाँ (भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ) और गैर-यादव पिछड़ी जातियाँ हैं। 2026 में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से बिहार में पहली बार BJP का अपना मुख्यमंत्री बना, जो एक ऐतिहासिक कदम था।
जनता दल यूनाइटेड (JDU)
जदयू की पहचान नीतीश कुमार की विकास और सामाजिक न्याय की विचारधारा से जुड़ी है। इस पार्टी ने अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलितों के बीच अपना ठोस वोट बैंक बनाया। 2025 के चुनाव में जदयू ने 85 सीटें जीतीं, जो 2020 के 43 सीटों से लगभग दोगुनी वृद्धि थी। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद भी जदयू विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और NDA सरकार में एक महत्वपूर्ण घटक है।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD)
लालू प्रसाद यादव की स्थापना की गई RJD का मुख्य वोट बैंक यादव और मुस्लिम समुदाय है। 1990 के दशक में इस पार्टी ने 'सामाजिक न्याय' के नारे के साथ बिहार की राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव किए। हालाँकि, 2025 के विधानसभा चुनाव में RJD का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। 2020 में 75 सीटें जीतने वाली पार्टी 2025 में मात्र 25 सीटों पर सिमट गई। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी विपक्ष के नेता की भूमिका निभा रही है, लेकिन विधानसभा में उनकी स्थिति काफी कमजोर है।
बिहार में गठबंधन की राजनीति: NDA vs महागठबंधन
बिहार की राजनीति में गठबंधन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कोई भी दल अकेले बहुमत हासिल करने में सक्षम नहीं है, इसलिए गठबंधन का गणित सत्ता तय करता है। वर्तमान में दो मुख्य गठबंधन हैं: NDA और महागठबंधन (INDIA गठबंधन)।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)
NDA में वर्तमान में BJP, JDU, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर), और राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में इस गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया। यह बिहार के चुनावी इतिहास में एक रिकॉर्ड जीत थी। NDA की सफलता का मुख्य कारण नीतीश कुमार की विकास की छवि, BJP के संगठन और केंद्र सरकार के समर्थन का संयोजन रहा है।
महागठबंधन (INDIA)
महागठबंधन में RJD, कांग्रेस, और वामदल (CPI(ML) मुख्य रूप से) शामिल हैं। 2025 के चुनाव में इस गठबंधन को भारी हार का सामना करना पड़ा। इसे कुल 35 सीटें ही मिलीं, जिनमें RJD की 25, कांग्रेस की 6 और वामदलों की 3 सीटें शामिल थीं। 2020 के चुनाव में RJD के पास 75 विधायक थे, जो 2025 में घटकर 25 रह गए। इसी तरह कांग्रेस की सीटें 19 से घटकर 6 रह गईं।
महागठबंधन के पतन के कई कारण रहे। पहला, 2024 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार के NDA में लौटने से इस गठबंधन को बड़ा झटका लगा। दूसरा, तेजस्वी यादव के 'नौकरी देने' के वादे ने 2020 में जो ज़ोर पकड़ा था, वह 2025 तक फीका पड़ गया। तीसरा, NDA की तरफ से महिला वोटरों को लुभाने वाली योजनाएँ, जैसे जल-जलीवन हार और महिला आरक्षण, ने बड़ा असर डाला।
2026 में राजनीतिक उठापटक: UCC का मुद्दा
वर्तमान में बिहार राजनीति में सबसे गर्म मुद्दा समान नागरिक संहिता (UCC) है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि BJP शासित राज्यों में 2029 तक UCC लागू किया जाएगा। इसके बाद RJD ने जदयू को खुला ऑफर दिया कि वह NDA छोड़कर महागठबंधन में लौट आए। RJD के वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र ने कहा कि यदि जदयू महागठबंधन में आता है तो तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री रहेंगे। जदयू ने इस ऑफर को अभी तक कोई भाव नहीं दिया है, लेकिन पार्टी का कहना है कि UCC के ड्राफ्ट आने के बाद ही इस पर विचार होगा।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस समय RJD की वापसी की संभावना कम दिख रही है। कारण स्पष्ट है: विधानसभा में राजद के पास 25 और कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं, जबकि जदयू के पास 85 विधायक हैं। जदयू के बिना महागठबंधन सत्ता में आने का कोई गणित नहीं बनता। इसके अलावा, जदयू के भीतर वर्तमान नेतृत्व भाजपा-विरोधी नहीं है, जिससे गठबंधन बदलने की संभावना और कम हो जाती है। अधिक जानकारी के लिए द हिंदू की इस रिपोर्ट को पढ़ सकते हैं।
बिहार राजनीति के प्रमुख मुद्दे: जाति, विकास और पलायन
जातिगत समीकरण

बिहार की राजनीति से जाति को अलग करके देखना असंभव है। 2023 में बिहार सरकार द्वारा कराए गए जाति सर्वे के अनुसार, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) राज्य की जनसंख्या का 36.01% है, जो सबसे बड़ा वर्ग है। पिछड़ा वर्ग (OBC) 27.12% है, जिसमें यादव अकेले 14.26% की हिस्सेदारी रखते हैं। अनुसूचित जातियाँ 19.65% और सामान्य वर्ग 15.52% है। ये आँकड़े द हिंदू द्वारा प्रकाशित विश्लेषण से लिए गए हैं।
इस सर्वे ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिहार में OBC और EBC मिलाकर 63% से अधिक आबादी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि कोई भी पार्टी इन वर्गों के बिना सत्ता में नहीं आ सकती। नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक रणनीति में EBC और महादलितों को अलग पहचान देकर उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया, जिसने उन्हें यादव-मुस्लिम वोट बैंक से अलग एक सामाजिक आधार दिया।
बिहार की जाति राजनीति का इतिहास कर्पूरी ठाकुर से जुड़ा है, जिन्होंने 1978 में मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों को लागू कर पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण दिया। इसके बाद 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से बिहार में पिछड़ी जातियों का राजनीतिक जागरण हुआ। लालू प्रसाद यादव ने इस लहर का लाभ उठाया और यादव-मुस्लिम गठबंधन को आधार बनाकर सत्ता में आए।
विकास का मुद्दा
2005 के बाद नीतीश कुमार ने 'विकास' को राजनीति का केंद्र बनाया। बिजली, सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएँ और शिक्षा में सुधार के दावे किए गए। महिलाओं के लिए 50% पंचायत आरक्षण, महिला सशक्तीकरण योजनाएँ और शराबबंदी जैसे कदम उठाए गए। इन योजनाओं का वोटरों पर सकारात्मक असर पड़ा, खासकर महिला मतदाताओं पर, जो 2025 के चुनाव में NDA के पक्ष में एक बड़ा कारण बना।
हालाँकि, विकास के दावों के बावजूद बिहार आर्थिक रूप से अभी भी पिछड़ा हुआ राज्य है। वित्त वर्ष 2023-24 में बिहार में प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय मात्र 32,227 रुपए थी, जो देश के औसत से कहीं कम है। आज तक की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार का वर्कर-पॉपुलेशन रेशियो (WPR) 33.5% था, जबकि भारत का औसत 43.7% है।
पलायन की समस्या

पलायन बिहार की सबसे गंभीर और लंबे समय से चली आ रही समस्या है। 2011 की जनगणना के अनुसार, 74.54 लाख बिहारी रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर गए थे। ई-श्रम पोर्टल पर बिहार से 3.16 करोड़ से अधिक लोगों ने पंजीकरण कराया है, जो उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा सबसे बड़ा आँकड़ा है। ये आँकड़े NDTV की इस रिपोर्ट से लिए गए हैं।
2025 के विधानसभा चुनाव में पलायन एक बड़ा मुद्दा बना। NDA ने एक करोड़ नौकरियाँ पैदा करने का वादा किया, जबकि महागठबंधन ने 'हर घर में एक सरकारी नौकरी' का वादा किया। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी पलायन को अपने अभियान का केंद्र बनाया। बिहार में मात्र 3,386 फैक्ट्रियाँ हैं, जिनमें 1.17 लाख लोगों को ही रोजगार मिला है, जो पलायन की जड़ को दर्शाता है।
बिहार विधानसभा और लोकसभा का समीकरण
बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं, जिनमें बहुमत का आँकड़ा 122 है। 2025 के विधानसभा चुनाव में NDA ने 202 सीटें जीतीं, जिसमें BJP को 89, JDU को 85, LJP(रामविलास) को 19, HAM(सेक्युलर) को 5 और रालोमो को 4 सीटें मिलीं। महागठबंधन को 35 सीटें मिलीं, जिनमें RJD की 25, कांग्रेस की 6 और वामदलों की 3 सीटें शामिल हैं। अन्य दलों (AIMIM 5, BSP 1) ने 6 सीटें जीतीं।
बिहार से लोकसभा में कुल 40 सीटें हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA ने 30 सीटें जीतीं (BJP 12, JDU 12, LJP(रामविलास) 5, HAM 1), जबकि INDIA गठबंधन को 10 सीटें मिलीं (RJD 4, कांग्रेस 3, CPI(ML) 2, निर्दलीय 1)। 2019 में NDA ने 39 में से 39 सीटें जीती थीं, इसलिए 2024 में 9 सीटों का नुकसान हुआ। द हिंदू की इस रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा का वोट शेयर 20.51% और जदयू का 18.53% रहा।
| गठबंधन / दल | विधानसभा 2025 सीटें (243) | लोकसभा 2024 सीटें (40) |
|---|---|---|
| NDA कुल | 202 | 30 |
| BJP | 89 | 12 |
| JDU | 85 | 12 |
| LJP(रामविलास) | 19 | 5 |
| HAM(सेक्युलर) | 5 | 1 |
| रालोमो | 4 | 0 |
| महागठबंधन कुल | 35 | 10 |
| RJD | 25 | 4 |
| कांग्रेस | 6 | 3 |
| CPI(ML) | 2 | 1 |
| अन्य (AIMIM आदि) | 6 | 0 |
आने वाले चुनावों की संभावित तस्वीर
बिहार में अगला विधानसभा चुनाव 2030 में होने वाला है, जबकि अगला लोकसभा चुनाव 2029 में। इन चुनावों तक पहुँचने से पहले कई राजनीतिक विकास देखने को मिल सकते हैं।
UCC और जदयू की स्थिति
अमित शाह की घोषणा के बाद UCC बिहार राजनीति का सबसे ज्वलंत मुद्दा बन गया है। यदि BJP UCC को लागू करने पर ज़ोर देती है और जदयू इसका विरोध करती है, तो NDA के भीतर तनाव बढ़ सकता है। हालाँकि, वर्तमान परिस्थितियों में जदयू के NDA छोड़ने की संभावना कम है, क्योंकि पार्टी के भीतर वर्तमान नेतृत्व भाजपा के साथ बना रहने के पक्ष में है। साथ ही, महागठबंधन का संख्याबल इतना कमजोर है कि जदयू के बिना सत्ता का गणित नहीं बनता।
RJD की चुनौतियाँ
RJD के लिए 2030 तक का सफर आसान नहीं होगा। 25 विधायकों के साथ पार्टी विधानसभा में विपक्ष के नेता की कुर्सी भी मुश्किल से बनाए हुए है। यदि विधायकों का टूटना शुरू होता है, तो यह कुर्सी भी खिसक सकती है। तेजस्वी यादव को अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी। उन्हें यादव-मुस्लिम वोट बैंक से परे जाकर EBC और दलित वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करना होगा।
नीतीश कुमार की भविष्य भूमिका
नीतीश कुमार अब राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन उनका बिहार राजनीति पर प्रभाव जारी है। उनके बेटे निशांत कुमार, जो वर्तमान में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं, को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएँ बनी हुई हैं। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जदयू का नाम बदलकर 'जनता दल-नीतीश' किया जा सकता है और भविष्य में पार्टी का भाजपा में विलय होने की संभावना भी इसके बाद तेज़ी से बढ़ सकती है। हालाँकि, ये अभी केवल अनुमान हैं और इनकी पुष्टि किसी आधिकारिक बयान से नहीं हुई है।
जन सुराज और अन्य दलों की स्थिति
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी 2025 के चुनाव में बांकीपुर सीट से जीत दर्ज कर सकी। हालाँकि पार्टी का कुल प्रभाव सीमित रहा, लेकिन प्रशांत किशोर की रणनीति और पलायन के मुद्दे को उठाने के कारण उन्हें युवा वोटरों के बीच कुछ समर्थन मिला है। आने वाले वर्षों में जन सुराज एक तीसरी ताकत के रूप में उभर सकता है, खासकर यदि वह अपने संगठन को मजबूत कर पाता है।
AIMIM का प्रभाव सीमावर्ती जिलों (किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार) तक सीमित है, जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है। इस पार्टी ने 2025 में 5 सीटें जीतीं, लेकिन राज्य स्तर पर इसका प्रभाव नगण्य है।
बिहार की राजनीति का अगला बड़ा मोड़ 2029 के लोकसभा चुनावों में दिख सकता है। यदि NDA बिहार में अपनी स्थिति बनाए रखता है, तो 2030 के विधानसभा चुनावों में भी उसकी स्थिती मजबूत रहेगी। लेकिन यदि UCC या किसी अन्य मुद्दे पर NDA के भीतर दरार पड़ती है, तो बिहार राजनीति में एक बार फिर उठापटक देखने को मिल सकती है।
अरविंदालय डेली पर बिहार की राजनीति से जुड़ी और खबरों और विश्लेषणों के लिए बने रहें। हमारा प्रयास है कि आपको तथ्यात्मक, संतुलित और सरल हिंदी में राजनीतिक विश्लेषण उपलब्ध कराया जाए। आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए कमेंट में अपने विचार साझा करें और हमारे न्यूज़लेटर से जुड़ें ताकि बिहार की हर बड़ी खबर सबसे पहले आप तक पहुँचे।
Frequently Asked Questions
बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री कौन हैं?
अप्रैल 2026 से बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं, जो भारतीय जनता पार्टी (BJP) से हैं। वे बिहार के पहले BJP मुख्यमंत्री हैं। नीतीश कुमार ने राज्यसभा सांसद बनने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था।
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में NDA को कितनी सीटें मिलीं?
2025 के विधानसभा चुनाव में NDA ने 243 में से 202 सीटें जीतीं। इसमें BJP को 89, JDU को 85, LJP(रामविलास) को 19, HAM(सेक्युलर) को 5 और रालोमो को 4 सीटें मिलीं। महागठबंधन को 35 सीटें मिलीं।
बिहार जाति सर्वे 2023 के अनुसार EBC और OBC की जनसंख्या कितनी है?
2023 के जाति सर्वे के अनुसार, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार की जनसंख्या का 36.01% है और पिछड़ा वर्ग (OBC) 27.12% है। यादव OBC में सबसे बड़ा समूह हैं, जिनकी हिस्सेदारी 14.26% है।
बिहार से लोकसभा में कितनी सीटें हैं और 2024 में NDA को कितनी मिलीं?
बिहार से लोकसभा में कुल 40 सीटें हैं। 2024 के चुनाव में NDA ने 30 सीटें जीतीं (BJP 12, JDU 12, LJP-रामविलास 5, HAM 1), जबकि INDIA गठबंधन को 10 सीटें मिलीं।
बिहार में UCC का मुद्दा क्यों उठा है?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि BJP शासित राज्यों में 2029 तक समान नागरिक संहिता (UCC) लागू किया जाएगा। इसके बाद RJD ने जदयू को NDA छोड़कर महागठबंधन में आने का ऑफर दिया, लेकिन जदयू ने अभी तक इस पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है।
